Thursday, 12 March 2015

COTTON AND COTTON SEEDS: HEALTH BENEFITS AND USES OF COTTON PLANTS (औषधीय गुणों का भण्डार कपास )



परिचय :- 

कपास की खेती भारत में प्राचीन समय से होती आ रही है। कपास हल्का, मीठा एवं वात (गैस) को नष्ट करने वाला होता है। इसके पत्ते कान के दर्द, कान में आवाज सुनाई देना, कान का बहना, बहरापन आदि को दूर करता है। इसका प्रयोग मूत्र रोगों में भी किया जाता है। कपास तीन प्रकार के होते हैं।


रंग : 
कपास के पत्ते हरे और रुई सफेद होती है।

स्वाद :
 
इसका स्वाद फीका होता है।

स्वरूप :
 
कपास आमतौर पर हर जगह पाई जाती है। इसके फूल पीले रंग के होते हैं और बीच में लाल रंग के होते हैं। कपास में गूलर के जैसे तीन कोणों वाले फल निकलते हैं जिसके अन्दर कपास की रुई होती है। जब कपास के फल पककर फट जाते हैं तब इसके अन्दर की रुई बाहर निकल आती है। जब कपास के फलों को चरखी में ओटा जाता है तब इसके बीज निकल आते हैं जिसे बिनौले कहते हैं।

प्रकृति :
 
यह गर्म और शीतल प्रकृति की होती है।

गुण : 
कपास स्तनों में दूध बढ़ाने वाला, बल पैदा करने वाला, पित्त, कफ, जलन, भ्रम, भ्रान्ति और बेहोशी आदि को दूर करने वाला होता है।




विभिन्न रोगों में उपयोग :

1. 
बुखार: कपास के बीजों का काढ़ा बनाकर बुखार से पीड़ित रोगी को पिलाने से बुखार ठीक होता है। एक निश्चित समय पर आने वाले बुखार में यदि इसका सेवन बुखार आने से पहले रोगी को कराएं तो बुखार नहीं आता।

2. 
आमातिसार (आंवयुक्त दस्त):
·         आमातिसार के रोगी को कपास के बीजों के चाय में डालकर सेवन कराना चाहिए। इससे आमातिसार के रोग में बेहद लाभ मिलता है।
·         आमातिसार के रोगी को 10 से 20 मिलीलीटर कपास के पत्तों का रस निकालकर लस्सी के साथ सेवन कराना चाहिए। इसका सेवन दिन में 2 बार करने से आमातिसार रोग ठीक होता है।

3. 
मासिकधर्म सम्बंधी परेशानियां:
 vमासिकधर्म कष्ट के साथ आना या ठंड के कारण मासिकधर्म का कम आना आदि रोग में कपास की छाल का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इससे मासिकधर्म का कष्ट दूर होता है और मासिकधर्म नियमित रूप से आने लगता है।

 vकपास की छाल का काढ़ा 40 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से मासिकधर्म खुलकर आता है।

 vमासिकधर्म का रुक जाना या मासिकधर्म समय से न आना आदि रोग में लगभग 40 ग्राम कपास की जड़ को यवकूट करके लगभग 1 लीटर पानी में उबालें। जब यह उबलते-उबलते एक चौथाई की मात्रा में शेष रह जाए तो इसे छानकर पीएं। इस तरह प्रतिदिन सुबह-शाम काढ़ा बनाकर पीने से मासिकधर्म सम्बंधी परेशानी दूर होकर मासिकधर्म नियमित होता है।
         
 vकपास का गूदा 24 ग्राम, अमलताश का गूदा लगभग 30 ग्राम, सौंफ, तुख्म गाजर, सोया, गुलाब फशा 10-10 ग्राम और पुराना गुड़ 30 ग्राम। इन सभी को 750 मिलीलीटर पानी के साथ आग पर पकाएं। जब यह पकते-पकते 250 मिलीलीटर बच जाए तो इसे छानकर पीएं। इससे माहवारी खुलकर आने लगती है। यह गर्भवती स्त्री को नहीं पिलाना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात हो सकता है। इसके सेवन से मासिकधर्म का रुक-रुककर आना या देर से आना आदि रोग ठीक होता है। इसे लगातार 3 दिनों तक पीने से मासिकधर्म नियमित और निश्चित समय पर आने लगता है।
         
vकपास के 100 ग्राम पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब यह उबलकर केवल 250 मिलीलीटर की मात्रा में बचा रह जाए तो इसे छानकर थोड़ा सा गुड़ मिलाकर सेवन करें। इससे मासिकधर्म सम्बंधी परेशानियां दूर होती है।

4. 
पक्षाघात (लकवा, परालिसिस): 
लकवा से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए कपास की सूखी जड़ को पीसकर 6 ग्राम शहद में मिलाकर चटाना चाहिए। इससे लकवा रोग ठीक होता है।

5. 
प्रदर रोग:         
vकपास की जड़ का चूर्ण 1-2 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से श्वेत प्रदर में खून का आना बंद होता है।
         
vकपास की जड़ की छाल 2 से 4 ग्राम की मात्रा में चावल के धोवन के साथ सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है।

6. 
पथरी: 
कपास की जड़ का काढ़ा बना कर पीने से पेट की पथरी गल जाती है तथा पेट का फूलना ठीक होता है।

7. 
प्रसव के बाद की परेशानियां: 
प्रसव के बाद उत्पन्न रोगों में कपास की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से गर्भाशय सम्बंधी रोग जल्दी ठीक होते हैं।

8. 
प्रसूता स्त्री के स्तनों में दूध का कम होना:   
      
vकपास के बीजों को पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण दिन 2 बार प्रसूता स्त्री को खिलाएं। इससे स्तनों में दूध की कमी या न बनने की समस्या दूर होती है।


vकपास के बीज की गिरी को लगभग 2 से 3 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें और इस चूर्ण को दूध में डालकर खीर बनाकर स्त्री को खिलाएं। इससे स्त्री के स्तनों में दूध बढ़ता है।


9. उदासी व सुस्ती: 
कपास के फूलों का शर्बत बनाकर पीने से उदासी व आलस्य दूर होता है। यह रोजाना 3-4 बार पीने से आलस्य या उदासीनता खत्म होती है।

10. 
मूत्ररोग: 
मूत्रकृच्छ रोग से परेशान रोगी को कपास या बनकपास के पत्तों को दूध में पीसकर पीना चाहिए। इससे मूत्रकृच्छ रोग ठीक होता है। ध्यान रखें कि इसका प्रयोग गर्भावस्था के दौरान न करें क्योंकि यह गर्म होता है और उत्तेजना पैदा कर सकता है।

11. 
हृदय रोग: 
कपास के चार फलों को एक कप पानी में भिगोंकर रख दें। चार-पांच घंटे बाद फलों को पानी में अच्छी तरह मथ लें। इसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से हृदय रोग ठीक होता है।

12. पीलिया रोग: 
रात को 8 ग्राम कपास की मिंगी को पानी में भिगोंकर रख दें। सुबह इस मिगीं को पानी में अच्छी तरह घोटकर छान लें और इसमें थोड़ा-सा सेंधानमक मिलाकर पीएं। इसके सेवन से पीलिया रोग ठीक होता है।

13. 
मानसिक उन्माद (पागलपन): 
लगभग 10 ग्राम कपास के फूल व 10 ग्राम गुलाबजल को 10 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़ा में 20 ग्राम गुड़ मिलाकर चाशनी बना लें। यह चाशनी रोजाना सुबह-शाम 6 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से पागलपन या उन्माद ठीक होता है।

14. 
शारीरिक शक्ति कम होना: 
शारीरिक रूप से कमजोर व पतले रोगी को कपास की मिंगी (बिनौला) लगभग 10 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ खीर बनाकर खाना चाहिए। इससे शारीरिक शक्ति बढ़ती है और पतलापन दूर होता है।


Show Comments: OR
Comments
0 Comments
Facebook Comments by

0 comments:

Post a Comment