Monday, 23 March 2015

Advantages of the 'Plough Pose' in Yoga ( हलासन से तीब्र मेधा शक्ति पायें तथा पीठ दर्द एवं मोटापे को दूर करें )

इस आसन के अभ्यास की स्थिति में आसन करने वाले व्यक्ति का आकार हल के समान होता हैइसलिए इसे हलासन कहते हैं। अगर आप दिनभर ऑफिस में बैठ कर काम करते हैं और आपकी गर्दन और पीठ हमेशा अकड़ी रहती है तो यह आसन उसे ठीक कर सकता है। शास्त्रों के अनुसर जिस व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी जितनी मुलायम व लचीली होगा व्यक्ति उतना ही स्वस्थ एवं लम्बी आयु को प्राप्त करेगा। हलासन के अभ्यास से थायरायड तथा पैराथायरायड ग्रंथियों की अच्छी तरह से मालिश हो जाती हैजिससे गले सम्बन्धी सभी रोग दूर हो जातेहैं। इस आसन को करते समय हृदय व मस्तिष्क को बिना किसी कोशिश की खून की पूर्ति होती है। जिससे हृदय मजबूत होता है और शरीर में खून का बहाव तेजी से होता है।
halasana-sex-8

यह आसन `कुण्डलिनी´ को जागृत करता है। इस आसन के अभ्यास से मेरूदंड लचीला और क्रियाशील बनता है। यह आसन खून को साफ करके उसके बहाव को ठीक करता है। इस आसन के द्वारा शरीर स्वस्थ, सुंदर व कांतिमय बनता है। इस आसन का अभ्यास स्वच्छ वातावरण व शुद्ध हवा वाले स्थान पर चटाई या चादर बिछाकर करें। हलासन का अभ्यास दो विधियों द्वारा किया जाता है-
पहली विधि-  
हलासन को करने के लिए सबसे पहले नीचे पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को बगल में सीधा व जमीन से सटाकर रखें। फिर दोनों पैरों को आपस में मिलाकर रखें तथा एड़ी व पंजों को भी मिलाकर रखें। अब दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएं, पैरों को उठाने के क्रम में पहले 30, 60 फिर 90 डिग्री का कोण बनाते हुए पैरों को सिर के पीछे की ओर जमीन पर लगाएं और पैरों को बिल्कुल सीधा रखें। अपने हाथ को सीधा जमीन पर ही टिका रहने दें। इस स्थिति में आने के बाद ठोड़ी सीने के ऊपर के भाग पर अर्थात कंठ में लग जायेगी। हलासन की पूरी स्थिति बन जाने के बाद 8 से 10 सैकेंड तक इसी स्थिति में रहें और श्वास स्वाभाविक रूप से लेते व छोड़ते रहें। फिर वापिस सामान्य स्थिति में आने के लिए घुटनों को बिना मोड़े ही गर्दन व कंधों पर जोर देकर धीरे-धीरे पैरों को पुन: अपनी जगह पर लाएं।

दूसरी विधि-
इस आसन में पहले जमीन पर लेट कर पूरे शरीर को सीधा रखें। अपने दोनों पैरों, एड़ियों व अंगूठों को आपस में सटाकर रखें। दोनों पैरों को बिल्कुल सीधा तान कर रखें तथा गर्दन और सिर को भी सीधा रखें। अब श्वास खींचते हुए दोनों हाथों को बराबर में रखते हुए ऊपर की ओर लाएं तथा हथेलियों को आगे सिर की तरफ लाते हुए सांस लेने तथा हाथ उठाने की क्रिया एक साथ करें तथा दोनों हाथों के द्वारा जमीन (फर्श) छूने तक सांस लेने की क्रिया जारी रखें। हाथ जमीन पर सटने के बाद सांस छोड़ें। इस क्रिया के तुरंत बाद ही सांस लें और दोनों पैरों को ऊपर उठाएं तथा श्वास छोड़ते ही पैरों को एकदम से सीधा आसमान की ओर उठा दें। जब पैर पूरी तरह ऊपर उठ जाएं तब सांस छोड़ना शुरू करें और साथ ही दोनों पैरों को सिर के सामने जमीन की तरफ करें। इसके साथ ही पैरों सिर के सामने जमीन की ओर तथा हाथों की अंगुलियों से ऊपर की ओर झुकाना आरंभ करें।  ऐसा करते समय यदि पैरों की अंगुलियां जमीन को न स्पर्श करें तो जहां तक नीचे ले जाना सम्भव हो वहा तक ले जाएं। इस स्थिति में आने तक सांस छोड़ने की क्रिया समाप्त हो जानी चाहिए और श्वास सामान्य रूप से लेना व छोड़ना शुरू कर दें। 10 सैकेंड तक इस अवस्था में रहने के बाद दुबारा धीरे-धीरे वास्तविक अवस्था में आ जाएं।

विशेष- 
हलासन को करते समय अपने दोनों पैर कड़े तथा अंगुलियां बाहर की ओर फैलाकर रखें। इसमें घुटने ढीले और मुड़े हुए नहीं होने चाहिए। बांहों, हाथों तथा अंगुलियों को एक-दूसरे के समान दूरी पर रखें, परंतु पैर की अंगुलियां तथा हाथों की अंगुलियों को जितना हो सके उतनी पास रखें। पूर्ण रूप से हलासन बनने के बाद पुन: सामान्य स्थिति में आने के लिए पहले कंधों को जमीन पर आने दें, छाती, फिर कूल्हे के बीच का भाग, कमर का पिछला भाग तथा अंत में जांघों, पैरों और एड़ियों को 1-1 इंच करके जमीन (फर्श) तक लाएं। लौटते समय हाथों को अपने स्थान पर ही रहने दें तथा केवल पैरों को सीधा करें। एड़ियां फर्श पर आ जाने के बाद दोनों हाथों को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं तथा उन्हें समान दूरी पर रखते हुए वापस जमीन पर लाएं।  इस क्रिया को एक बार पूरा होने पर 6 से 8 सैकेंड तक आराम करें। पहले-पहले इसका अभ्यास 1 बार ही करें। धीरे-धीरे इसको बढ़ाकर 4 बार तक करें।


हलासन से लाभ

v इस आसन से रीढ़ की हड्डियां लचीली बनी रहती है जिससे शरीर फूर्तिला और जवान बना रहता है।

v पेट बाहर नहीं निकलता है और शरीर सुडौल दिखता है।

v वीर्य विकार और श्वसन संबंधी रोग में भी इस आसन से काफी लाभ मिलता है।

v यह आसन शरीर के भीतरी अंगों की मालिश करता है और मांनसिक क्षमता को बढ़ाता है।


v यह आसन मनुष्य की प्रज्ञा तथा बुद्धि को बढ़ाता है।

v यह आसन मस्तिष्क सम्बन्धी कार्य करने वाले बुद्धिजीवियों के लिए लाभकारी है।

v इस आसन को करने से कमर पतली होती है तथा पेट की चर्बी को कम कर मोटापे को दूर करता हैजिससे शरीर सुडौल बनता है।

v यह आसन बालों का पकना व झड़ना खत्म करता है। यह आसन स्नायु संस्थान (नर्वसिस्टम) तथा पाचन तन्त्र को शक्ति प्रदान करता है।

v यह आसन शरीर के भीतरी अंगों की मालिश करता है और मांनसिक क्षमता को बढ़ाता है।

v इस आसन को करने से रीढ़ की हड्डी के एक-एक डिस्क की मसाज हो जाती है। यह आसन मेरुदंड के लिए अधिक लाभकारी है तथा इससे मेरूदंड लचीली होती है। शास्त्रों के अनुसर जिस व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी जितनी मुलायम व लचीली होगी वह उतना ही स्वास्थ्य एवं लम्बी आयु को प्राप्त करेगा। यह आसन मनुष्य की बुद्धि को बढ़ाता है।

v यह आसन मस्तिष्क सम्बन्धी कार्य करने वाले बुद्धिजीवियों के लिए लाभकारी है।


v इस आसन को प्रतिदिन करने से मुख पर तेजचेहरा सुंदर व कान्तिमय बनता है।

v इस आसन को करने से कमर पतली होती है तथा पेट की चर्बी को कम कर मोटापा दूर होता हैजिससे शरीर सुडौल बनता है।

v यह आसन यौन ग्रंथियों के दोषों को दूर कर सशक्तपुष्ट व सक्रिय बनाता है। इस आसन से कामशक्ति की कमी (सेक्युअल डिबीलिटी) तथा नपुंसकता आदि दूर होते हैं।

v यह आसन चर्मरोग को रोकता है।  हलासन के अभ्यास से थाइराईड (Thyroid) तथा पैराथाइराड ग्रंथियों (Parathyroid Glands)  की अच्छी तरह से मालिश हो जाती हैजिससे गले सम्बन्धी सभी रोग दूर हो जाते हैं।

v इस आसन को करते समय हृदय व मस्तिष्क को बिना किसी कोशिश की खून की पूर्ति होती है। जिससे हृदय मजबूत होता है और शरीर में खून का बहाव तेजी से होता हैजो खून साफ होकर विशेष रूप से शरीर के ऊपरी भाग में एकत्र (जमा) होता है।

v नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए यह आसन बहुत उपयोगी है |

v यह आंखों की बीमारी को दूर करता है तथा कंधों को मजबूत बनाता है।

v यह आसन पेट के सभी अंगों की मसाज कर अपचकब्ज व वायु रोग को खत्म करता है।

v यह छाती व फेफड़ों के अनेक रोगों के लिए भी लाभकारी होता है। यह भूख को बढ़ाता है तथा मधुमेह (डायबिटीज) के रोगों के लिए अधिक लाभकारी आसन है।

v यह आसन स्त्रियों के लिए लाभकारी होता है। युवा लड़कियों के लिए इसका अभ्यास लाभकारी होता है।


v यह आसन उन स्त्रियों को करना चाहिए जिनका गर्भाशय स्थिर न हो उन्हें इस आसन के साथ-साथ उड्डियान बंध का भी अभ्यास करना चाहिए।


Show Comments: OR
Comments
0 Comments
Facebook Comments by

0 comments:

Post a Comment