Thursday, 12 March 2015

Swine Flu-H1N1 Flu Virus (स्वाइन फ्लू से बचने के आसान आयुर्वेदिक उपाय)


क्या है स्वाइन फ्लू?
स्वाइन फ्लू , इनफ्लुएंजा यानी फ्लू वायरस के अपेक्षाकृत नए स्ट्रेन इनफ्लुएंजा वायरस A से होने वाला इनफेक्शन है। इस वायरस को ही H1N1 कहा जाता है। इसके इनफेक्शन ने 2009 और 10 में महामारी का रूप ले लिया था-लेकिन WHO ने 10 अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने का भी ऐलान कर दिया था। अप्रैल 2009 में इसे सबसे पहले मैक्सिको में पहचाना गया था। तब इसे स्वाइन फ्लू इसलिए कहा गया था क्योंकि सुअर में फ्लू फैलाने वाले इनफ्लुएंजा वायरस से ये मिलता-जुलता था।


क्या है स्वाइन फ्लू के लक्षण ?
स्वाइन फ्लू के लक्षण भी सामान्य एन्फ्लूएंजा जैसे ही होते हैं
  • -नाक का लगातार बहना, छींक आना
  • -कफ, कोल्ड और लगातार खांसी
  • -मांसपेशियां में दर्द या अकड़न
  • -सिर में भयानक दर्द
  • -नींद न आना, ज्यादा थकान
  • -दवा खाने पर भी बुखार का लगातार बढ़ना
  • -गले में खराश का लगातार बढ़ते जाना
स्वाइन फ्लू का वायरस तेजी से फैलता है। कई बार मरीज के आसपास रहने वाले लोगों और तिमारदारों को चपेट में ले लेता है। लिहाजा, किसी में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखें तो उससे कम से कम तीन फीट की दूरी बनाए रखना चाहिए, स्वाइन फ्लू का मरीज जिस चीज का इस्तेमाल करे, उसे भी नहीं छूना चाहिए।

नॉर्मल फ्लू से कैसे अलग
सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के वायरस में एक फर्क होता है। स्वाइन फ्लू के वायरस में चिड़ियों, सूअरों और इंसानों में पाया जाने वाला जेनेटिक मटीरियल भी होता है। सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के लक्षण एक जैसे ही होते हैं, लेकिन स्वाइन फ्लू में यह देखा जाता है कि जुकाम बहुत तेज होता है। नाक ज्यादा बहती है। पीसीआर टेस्ट के माध्यम से ही यह पता चलता है कि किसी को स्वाइन फ्लू है। स्वाइन फ्लू होने के पहले 48 घंटों के भीतर इलाज शुरू हो जाना चाहिए। पांच दिन का इलाज होता है, जिसमें मरीज को टेमीफ्लू दी जाती है।कब तक रहता है वायरस?
एच1एन1 वायरस स्टील, प्लास्टिक में 24 से 48 घंटे, कपड़े और पेपर में 8 से 12 घंटे, टिश्यू पेपर में 15 मिनट और हाथों में 30 मिनट तक एक्टिव रहते हैं। इन्हें खत्म करने के लिए डिटर्जेंट, एल्कॉहॉल, ब्लीच या साबुन का इस्तेमाल कर सकते हैं। 
किसी भी मरीज में बीमारी के लक्षण इन्फेक्शन के बाद 1 से 7 दिन में डिवेलप हो सकते हैं। लक्षण दिखने के 24 घंटे पहले और 8 दिन बाद तक किसी और में वायरस के ट्रांसमिशन का खतरा रहता है।

कैसे फैलता है?
जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। यह कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, कीबोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी यह वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया हो।

यह रहें सावधान
  • 5 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं। जिन लोगों को निम्न में से कोई बीमारी है, उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए :
  • फेफड़ों, किडनी या दिल की बीमारी
  • मस्तिष्क संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी मसलन, पर्किंसन
  • कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग
  • डायबीटीजं
  • ऐसे लोग जिन्हें पिछले 3 साल में कभी भी अस्थमा की शिकायत रही हो या अभी भी हो। ऐसे लोगों को फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं का प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) शरीर में होने वाले हॉरमोन संबंधी बदलावों के कारण कमजोर होता है। खासतौर पर गर्भावस्था के तीसरे चरण यानी 27वें से 40वें सप्ताह के बीच उन्हें ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है।

बचने के लिए करे इन उपायों का प्रयोग-

तुलसी की पत्तियाँ - 
1-दोनों तरफ से धुली हुई तुलसी की पत्तियाँ रोज सुबह लें। तुलसी का अपना एक चिकित्सीय गुण है। यह गले और फेफड़े को साफ रखती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर इसके संक्रमण से बचाती है।
2-तुलसी पत्र, कालीमिर्च उबाल-छानकर पिएं। दिन भर सामान्य जल की जगह तुलसीयुक्त गुनगुने जल का सेवन करें। 

गिलोय- 
1-गिलोई कई क्षेत्रों में सामान्य रूप से पाई जाती है| गिलोई की एक फुट लंबी शाखा लें इसमें तुलसी की 5-6 पत्तियाँ मिलाकर इसे 15-20 मिनट तक उबाल लें, जब तक कि इसमे इसके तत्व ना घुल जाएँ| 
इसमें स्वादानुसार काली मिर्च, सेंधा नमक (यदि व्रत है तो) या काला नमक, मिश्री मिला लें| इसे ठंडा होने दें और गुनगुने का सेवन करें| इम्यूनिटी के लिए यह कारगर है| यदि गिलोई का पौधा उपलब्ध नहीं हो तो हमदर्द या अन्य किसी ब्रांड का गिलोई पाउडर इस्तेमाल कर यह काढ़ा बना सकते हैं।
2-गिलोय सत्व दो रत्ती यानी चौथाई ग्राम पौना गिलास पानी के साथ लें।
3-गिलोय (अमृता) बेल की डंडी को पानी में उबाल या छानकर पिएं. या गिलोय सत्व दो रत्ती यानी चौथाई ग्राम पौना गिलास पानी के साथ लें
कपूर 
1-गोली के आकार का कपूर का टुकड़ा महीने में एक या दो बार लिया जा सकता है। बड़े लोग इसे पानी के साथ निगल सकते हैं और छोटे बच्चों को यह आलू या केले के साथ मलकर दे सकते हैं क्यों कि इसे सीधा लेना मुश्किल होता है। याद रखें कपूर को रोजाना नहीं लेना है इसे महीने में एक बार ही लें।
2-बच्चों को स्कूल भेजते बक्त उनकी रुमाल में 1-2 बूँद अमृतधारा/कर्पूरधारा लगाकर दें और उनको हर 2.3 धण्टे में उसे सूंघने के लिए कहें।

3-कपूर, छोटी इलायची और लौंग या दालचीनी को समान मात्रा में लेकर कूट लें. और कपड़े में बांधकर उसकी छोटी सी पोटली बनाकर साथ रखें. हर आधे घंटे में उसे सूंघते रहें.

ग्वारपाठा-
ग्वारपाठा आसानी से उपलब्ध पौधा है। इसकी कैक्टस जैसी पतली और लंबी पत्तियों में सुगंध रहित जैल होता है। इस जैल को एक टी स्पून में पानी के साथ लेने से त्वचा के लिए बहुत अच्छा रहेगा, जोड़ों का दर्द दूर होगा और साथ ही इम्यूनिटी बढ़ेगी।



लहसुन-
जो लोग लहसुन खाते हैं वे रोज सुबह दो कलियाँ कच्ची चबा सकते हैं। यह गुनगुने पानी से लिया जा सकता है। अन्य चीजों की बजाय लहसुन से इम्यूनिटी ज्यादा बढ़ती है।


नीम-
नीम में हवा को साफ करने का गुण होता है जिससे यह वायुजनित बीमारियों के लिए कारगर है, स्वाइन फ्लू के लिए भी। आप खून को साफ करने के लिए रोज 3-5 नीम की पत्तियाँ चबा सकते हैं।


दालचीनी- 
1-दालचीनी का चूर्ण का शहद के साथ सेवन काफी लाभदायक होता है |
2-दालचीनी की चाय बनाकर पीना भी लाभकारी होता है |

हल्दी-
1-हल्दी इस रोग में विशेष लाभकारी है। नियमित हल्दी युक्त दूध अथवा हल्दी, सेंधानमक, तुलसी पत्र पानी में उबालकर पीना भी फायदेमन्द है। 
2- आधा चम्मच हल्दी गरम पानी या शहद में मिलाकर भी लिया जा सकता है।

!-आंवला विटामिन सी से भरपूर होता  है। स्वाइन फ्लू में विटामिन सी का आहार लाभदायक होता है ,आंवला 2-विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। आंवला को चबा कर साबुत खा लें |
3-आवले कि चटनी बनाकर भी खा सकते है |
4-आंवले का जूस भी स्वाइन फ्लू में पीना चाहिए | तरल आहार का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करें। ठण्डा, गरम एक साथ न लें, विरुद्ध आहार-विहार से बचें। 
5-आधा चम्मच आंवला पाउडर को आधा कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिएं। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

  लेमन टी-
 ब्लैक टी अथवा विना दूध कि चाय  में नींबू की कुछ बूंदें डालकर पीना भी स्वाइन फ्लू में लाभदायक होता है |

आयुर्वेदिक काढ़ा
  • तुलसी के पत्ते - 5
  • लौंग - 4
  • कालीमिर्च - 4
  • दालचीनी - 1 ग्राम
  • अद्रक - 1 इंच
  • हल्दी - 1 ग्राम
  • कण्टकारी - 5 ग्राम
ताजा गिलोय की लकड़ी - 1 फीट ताजा उपलब्ध ना हो तो सूखी गिलोय का चूर्ण 5 ग्राम
इन सबको कूटकर 100 ग्राम पानी में मन्द आँच में उबालकर आधा पानी बचने पर सुबह खाली पेट पीलें। ऐसा 7 दिन के लिए करने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी जिससे सिर्फ स्वाइन फ्लू ही नहीं बल्कि दूसरे मौसमी संक्रमण भी नहीं हो पाएंगे। 
परिवार में जितने सदस्य हैं सभी को यह पिलाएं। मात्रा प्रति व्यक्ति के हिसाब से बढ़ा कर एकसाथ ही प्रिपरेशन करलें। 

आयुर्वेदिक औषधियां -
1-आयुर्वेदिक औषधि‘षडंग पानीय’ उबालकर पिएं। यह बाजार में तैयार भी मिलती है। 
2-यदि जुकाम या बुखार के सामान्य लक्षण महसूस हो रहे हैं तो ऊपर बताए काढ़े के साथ 
  • संजीवनी बटी - 1 गोली
  • लक्ष्मी विलास - 1 गोली
  • सुदर्शन घन वटी - 1 गोली

ये तीनों गालियाँ दिन में 3 बार लें ।
साथ में सितोपलादि चूर्ण - 3 ग्राम शहद के साथ मिलाकर दिन में 3 बार लें
3-यदि संक्रमण ज्यादा है तो -
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  • स्वर्ण वसन्त मालती - 2 ग्राम
  • अभ्रक भस्म - 5 ग्राम
  • प्रवाल पिष्टी - 5 ग्राम
  • गिलोय सत्त्व - 10 ग्राम 
  • श्वासकुठार रस - 10 ग्राम
  • सितोपलादि चूर्ण - 20 ग्राम

सब मिलाकर 2-2 ग्राम दिन में 3 या 4 बार शहद के साथ लें।
(चिकित्सा आयुर्वेद विशेषज्ञ की देखरेख में हो)
4-रोग नाशक द्रव्य के रूप में सुदर्शन क्वाथ या उनकी वटी/चूर्ण, भारंग्यादि क्वाथ, संशमनी वटी, गिलोय की वटी/चूर्ण/क्वाथ का सेवन करें।
5 -अन्य प्रभावी आयुर्वेदिक औषधियां-
  • मल्ल सिन्दूर
  • रस सिन्दूर
  • चन्द्रामृत रस
  • समीरपन्नग रस
  • चन्द्रामृत रस
  • च्यवनप्राश
  • वासावलेह
  • तालीसादी चूर्ण
  • खदिरादि वटी
  • लवंगादि वटी
  • 64 प्रहरी पीपल

(चिकित्सा आयुर्वेद विशेषज्ञ की देखरेख में हो)
अन्य उपाय -
  • पसीना आने पर तुरन्त कपड़े न निकालें, न ही तुरन्त पंखे या ठण्डे जल का प्रयोग करें। 
  • नमकयुक्त गुनगुने जल से स्नान लाभदायक है। 
  • दूषित जल व दूषित अन्न का प्रयोग न करें, बासी और गरिष्ठ भोजनों से बचें।
  • गिलोय, कालमेध, चिरायता, भुईं-आंवला, सरपुंखा, वासा इत्यादि जड़ी-बूटियां लाभदायक हैं।
  • बच्चे को यदि सर्दी-जुकाम, खाँसी है तो उसे स्कूल न भेजें।
  • किसी से हाथ नहीं मिलाएँ। गले नहीं मिलें।
  • भोजन करते समय हाथो को भली-भांति धो लेना चाहिए |
  • सार्वजनिक स्थानों, भी़ड़ भरे स्थानों पर थूकें नहीं।
  • खाँसी, छींक आने पर मुँह व नाक को रूमाल, टिशू पेपर से ढँक लें।
  • एक बार इस्तेमाल के बाद टिशू पेपर कू़ड़ेदान में फेंक दें। रूमाल को साबुन से धो लें।
  • छींकने, खाँसने और कहीं बाहर से आने के बाद हाथ साबुन से धोएँ।
  • अपनी आँख, नाक, मुँह को हाथ न लगाएँ। इससे वायरस फैलते हैं।
  • जिन लोगों को श्वसन तंत्र की बीमारी हो उनके पास न जाएँ। 
  • सर्दी के मरीज साफ-सुथरा रुमाल रखें और रोज बदलें।
  • घर में व आसपास स्वच्छता रखें। 
  • खान-पान का ख्याल रखें, तला-गला कम खाएँ। 
  • प्रदूषित, भीड़ भरे और गंदे क्षेत्रों में न जाएँ 
  • स्मोकिंग करने वालों से दूर रहें।
  • मरीज को भी मास्क लगाएँ और खुद भी उपयोग करें।
  • एन-95 मास्क का उपयोग करें। यह उपलब्ध नहीं होने पर थ्री लेयर्ड उपयोग करें। इसे गीला कर उपयोग करने पर संक्रमण की आशंका न के बराबर हो जाती है।

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