Saturday, 9 May 2015

NATURAL CURES FOR ANEMIA: YOGA POSES HELPS ANEMIA SUFFERERS FIND BALANCE(एनीमिया रोग के लिए योग - योगासन जिनके नियमित अभ्यास से आप एनीमिया जैसी प्राणघातक बीमारी से लड़ सकते है )


         YOGA POSES HELPS ANEAMIA SUFFERERS FIND BALANCE     
      योगासन जिनके नियमित अभ्यास से आप एनीमिया जैसी प्राणघातक बीमारी से लड़ सकते है  

जब हमारे खून में लाल रक्त कणिकाओं की कमी हो जाती है तो हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। हीमोग्लोबिन एक तरह का प्रोटीन होता है। यह शरीर में ऑक्सीजन के संचरण का काम करता है। अतः हीमोग्लोबिन की कमी से हमारी कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जो कार्बोहाइड्रेट और वसा को जला कर ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जरूरी है। अतः इस कारण हमारे शरीर और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। इसकी कमी से एनीमिया नाम का रोग हो जाता है। 
एनीमिया जैसी प्राणघातक बीमारी से निजात पाने के लिए व्यक्ति को योग का सहारा लेना लाभदायक साबित होता है | योगाभ्यास से एनीमिया जैसी बीमारी की समस्या से निजात सरलता से किया जा सकता है। इस समस्या का मूल कारण मन तथा भावनाओं का असंतुलन है जो अंत में शरीर को कमजोर एवं रोगी बना देता है। योग शरीर, मन एवं भावनाओं को स्वस्थ कर सम्पूर्ण स्वास्थ्य की रक्षा करता है। इसके लिए कुछ यौगिक क्रियाएं हैं जिनका अभ्यास कर आप एनीमिया की समस्या में राहत पा सकते हैं।
      आसन (ASANAS)-                                                                               
आसन के अभ्यास से शरीर में स्फूर्ति का संचार हो जाता है और हमारा शरीर तरोताजा महसूस करता है आसनों के अभ्यास से रक्त की शुद्धि होती है और रक्त का संचार सम्पूर्ण शरीर में हो जाता है अगर आसन के समय श्वास प्रश्वास ठीक तरह से किया जाये तो हमारे रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है | एनीमिया के रोगी में अक्सर कमजोरी तथा उदासी के लक्षण अधिकांश दिखाई देते हैं। इसलिए प्रारंभ में उन्हें कठिन आसनों के अभ्यास की सलाह नहीं दी जाती है। इस स्थिति में प्रारम्भ में सूर्य नमस्कार के एक या दो चक्र, शवासन ,वज्रासन, पवनमुक्तासन, मर्करासन, तितली आसन, गोमुख आसन, मण्डूक आसन आदि का ही अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। जैसे-जैसे स्थिति में सुधार होता जाए, अभ्यास में धीरे-धीरे पश्चिमोत्तासन ,सर्वांगासन ,धनुरासन, भुंजगासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, चक्रासन जैसे कठिन आसनों को जोड़ा जा सकता है।

        एनीमिया के रोग के लिए महत्वपूर्ण आसन -                                                                


एनीमिया एक ऐसा रोग है जो पूरे विश्व को अपने चपेट में ले चुका है। और सभी इस रोग से निजात पाना चाहते हैं। इसके लिए कई लोग तरह-तरह के बाजार में मिलने वाले तकनीकों का सहारा लेता है या दवाईयों का सहारा लेता है। तकनीक और दवाईयों का असर तो कम समय के लिए होता है। अतः आप दवाईयों के साथ योग को अपनाकर इस रोग से हमेशा के लिए निजात पा सकते हैं क्योंकि योगाभ्यास एक ऐसा साधन है जिसको आप नियम मानकर करेंगे तो आसानी से एनीमिया जैसी बीमारी के साथ-साथ कई तरह से बीमारियों से राहत पा जायेंगे। यहाँ हम आपको कुछ महत्वपूर्ण आसनों के बारे में बताने जा रहे है जिनका अभ्यास कर आप एनीमिया के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते है -

  1-   सूर्य नमस्कार (SUN SAUTATION)-                                                                            

 
सूर्य नमस्कार योगासन बारह योगासनों का संग्रहित रूप है। सूर्य नमस्कार या सूर्य नमन शरीरमन और आत्मा को स्वस्थ रखने के साथ-साथ ऊर्जा प्रदान करने में मदद करता है। सूर्य नमस्कार एक संपूर्ण एक्सर्साइज है। इसे करने से बॉडी के सभी हिस्सों की एक्सर्साइज हो जाती है। साथ ही फ्लेक्सिबिलिटी भी आती है। सूर्य नमस्कार सुबह के समय खुले में उगते सूरज की ओर मुंह करके करना चाहिए। इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और विटामिन डी मिलता है। इससे मानसिक तनाव से भी मुक्ति मिलती है।इस योग का अभ्यास सुबह करने से शरीर सारा दिन ऊर्जा से भरपूर और तरोताजा रहता है और शाम को करने से सारे दिन का थकान और तनाव दूर हो जाता है और शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। सूर्य नमस्कार को प्रतिदिन करने से एनीमिया की बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है | सूर्य नमस्कार को करने की विधि जानने के इए नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक करें --
  2-   वज्रासन  (VAJRASAN/ DIAMOND POSE )-                                                     

इससे शरीर में रक्त-संचार समरस होता है रक्ताल्पता की समस्या दूर हो जाती है और साथ ही साथ इसे करने से शिरा के रक्त को धमनी के रक्त में बदलने का रोग नहीं हो पाता। वज्रासन की तीन स्थितियाँ होती हैं। जब कोई वज्रासन की स्थिति में नहीं बैठ पाताउसके वै‍कल्पिक रूप में अर्धवज्रासन है। इस अर्धवज्रासन में टाँगें मोड़कर एड़ियों के ऊपर बैठा जाता है तथा हाथ को घुटनों कर रखा जाता है। इसे कुछ योगाचार वज्रासन ही मानते हैं।दूसरी स्थिति में पैरों की एड़ी-पंजे को दूर कर पुट्ठे फर्श पर टेक दिए जाते हैंकिंतु दोनों घुटने मिले हुए होना चाहिएइस स्थिति को भी वज्रासन कहा जाता है।तीसरी इसी स्थिति में पीठ के बल लेटकर दोनों हाथों की हथेलियों को सिर के नीचे एक-दूसरे से क्रास करती हुई कंधे पर रखने को ही हम- सुप्तवज्रासन कहते हैं। वज्रासन में बैठने से शरीर मजबूत और स्थिर बनता हैइसलिए इसका नाम वज्रासन है।

  3-   पवनमुक्तासन (PAVANMUKTASAN/ WIND-RELIEVING POSE)-
 
यह आसन शरीर में रक्त की कमी को रोकता है तथा शरीर के रक्त संचार को ठीक करता है | पवनमुक्तासन को करने के लिए भूमि पर चटाई बिछा कर चित्त होकर लेट जायें। पूरक करके फेफड़ों में श्वास भर लें। अब किसी भी एक पैर को घुटने से मोड़ दें। दोनों हाथों की अंगुलियों को मिलाकर उसके द्वारा मोड़े हुए घुटनों को पकड़कर पेट के साथ लगा दें। फिर सिर को ऊपर उठाकर मोड़े हुए घुटनों पर नाक लगाएं। दूसरा पैर ज़मीन पर सीधा रखें। इस क्रिया के दौरान श्वास को रोककर कुम्भक चालू रखें। सिर और मोड़ा हुआ पैर भूमि पर पूर्ववत् रखने के बाद ही रेचक करें। दोनों पैरों को बारी-बारी से मोड़कर यह क्रिया करें। 
  4-   मर्करासन (MARKARASAN/MONKEY POSE)-                                         

अवस्था-1 -पीठ के बल लेट जाइए। दोनों हाथों को कंधों की सिधाई में शरीर के अगल-बगल फैला दीजिए। दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर पंजों को जमीन पर रखिए। अब दोनों घुटनों को दांयी ओर जमीन पर ले जाइए तथा सिर को बांयी ओर घुमाइए। थोड़ी देर इस स्थिति में रुककर वापस पूर्व स्थिति में आइए। यही क्रिया दूसरी ओर भी कीजिए। इसकी पांच आवृत्तियों का अभ्यास कीजिए।  
अवस्था-2 -अवस्था 1 के प्रथम निर्देश का यथावत पालन करते हुए दांये पैर को घुटने से मोड़कर इसके तलवे को बांये पैर की जांघ पर रखिए। इस पैर के घुटने को बांयी ओर जमीन पर ले जाइए तथा सिर को दांयी ओर घुमाइए। इस अवस्था में आरमदेह अवधि तक रुककर वापस पूर्व स्थिति में आइए और यही क्रिया दूसरी ओर भी कीजिए। इसकी जांच आवृत्तियों का ठीक तरह अभ्यास कीजिए। 
अवस्था-3- अवस्था-के प्रथम निर्देश का यथावत पालन करते हुए दायें पैर को 90 डिग्री तक ऊपर उठाकर बांये हाथ की ओर ले आइए तथा सिर को दांयी ओर ले जाइए। इस स्थिति में आरामदायक अवधि तक रुककर वापस स्थिति में आइए तथा यही क्रिया दूसरी ओर कीजिए।
  5-   तितली आसन (TITLI ASANA/BUTTERFLY POSE)-                                          


दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर उंगलियों को आगे की ओर तथा पीछे की ओर चार-चार बार दबाएं। अब पूरे पंजे को आगे तथा पीछे की ओर चार-चार बार दबाएं। इसके बाद टखनों को चार-चार बार क्लॉकवाइज तथा एंटी- क्लॉकवाइज गोल-गोल घुमाएं। अब दोनों पैरों को घुटनों से मोडम् कर पंजों एवं तलवों को आपस में जोड़ें। घुटनों को जमीन से ऊपर तथा नीचे 20 बार उठाएं तथा नीचे करें। तितली आसन में बैठकर आगे की ओर इतना झुकें कि माथा जमीन पर आ जाये। इस स्थिति में थोड़ी देर रुककर वापस पूर्व स्थिति में आ जाएं।


  6-   गोमुख आसन(GAWMUKHASAN/COW FACE POSE)-                       
                     
इस आसन से कमर ,कंधे ,घुटने,पैर आदि पुष्ट और बलवान होते हैं। कन्धों का कड़ापन दूर करता है। छाती चौड़ी होती है।  यह आसन रक्त शुद्धि तथा उचित रक्त संचार करता है।  विषैले पदार्थो को गुर्दों से बाहर निकालता है। जमीन पर बैठ जाइए। लेफ्ट पैर को आगे से मोड़ कर पीछे की ओर इस तरह लगाइए कि एड़ी का भाग गुदा पर लगे। राईट पैर को मोड़िए और लेफ्ट पैर की तरह ऐसे लाइए ताकि राईट पैर की एड़ी नितम्ब की बगल में बिल्कुल लग जाए। लेफ्ट पैर का पंजा सीधा हो और जमीन से लगा रहे तथा राईट पैर का पंजा भी जमीन से लगा रहे। अब राईट हाथ को गले की बगल से पीठ की ओर ले जाइए। अब लेफ्ट हाथ को लेफ्ट बगल के नीचे से गर्दन की ओर इतना लाइए ताकि आठों उँगलियाँ आपस में फंस जाएं। हाथों की मुड़ी हुई कुहनियों को नीचे ले जाइए ताकि ये भाग राईट स्तन से बिल्कुल लग जाए। फिर कमर के भाग को सीधा रखते हुए स्थित रहिए। आँखें खुली रहें और श्वास साधारण रहे। अब इसी क्रिया को लेफ्ट हाथ की ओर भी कीजिए। दोनों स्थितियों में दोनों घुटने चिपके रहते हैं।

  7-   मण्डूक आसन(MADOOKASANA/FROG POSE)-                                              

 
पेट के लिए अत्यंत ही लाभयादयक इस आसन से अग्नयाशय सक्रिय होता है जिसके कारण डायबिटीज के रोगियों को इससे लाभ मिलता है। यह आसन उदर और हृदय के लिए भी अत्यंत लाभदायक माना गया है।यह आसन पेट के रोग जैसे कब्जगैसअफाराभूख न लगनाअपचभोजन का पाचन ठीक न होना आदि विकारों को दूर करता है। इस आसन से आमाशयछोटी आंतबड़ी आंत,  पित्तकोष,  पेन्क्रियाज,  मलाशय,  लिवरप्रजनन अंगों और किडनी आदि सभी अंगों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।सर्वप्रथम दंडासन में बैठते हुए वज्रासन में बैठ जाएं फिर दोनों हाथों की मुठ्ठी बंद कर लें। मुठ्ठी बंद करते समय अंगूठे को अंगुलियों से अंदर दबाइए। फिर दोनों मुठ्ठियों को नाभि के दोनों ओर लगाकर श्वास बाहर निकालते हुए सामने झुकते हुए ठोड़ी को भूमि पर टिका दें। थोड़ी देर इसी स्थिति में रहने के बाद वापस वज्रासन में आ जाए। 

 8-   धनुरासन (DHANURASAN/BOW POSE)-                                                            


इस मुद्रा में शरीर के दोनों अर्ध भाग ऊपर उठाये जाते हैं। यह आपकी पीठ की मांसपेशियों में कसाव लाता है और रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन को बनाये रखता है तथा इससे आपकी मुद्रा में और जीवन शक्ति में सुधार लाता है। अपने शरीर के भार को पेट पर संतुलित करने से पेट की चर्बी भी कम होती है जो कि अधिकाँश पुरुषों की एक मुख्य समस्या होती है। तथा महिलाओं में एनीमिया की समस्या में भी लाभकारी है |इसे करने के लिए सबसे पहले चटाई पर पेट के बल लेट जाएं। ठुड्डी ज़मीन पर रखें। पैरों को घुटनों से मोड़ें और दोनों हाथों से पैरों के पंजे पकड़ें। फिर सांस भर लीजिए और बाजू सीधे रखते हुए सिर, कंधे, छाती को जमीन से ऊपर उठाएं। इस स्थिति में सांस सामान्य रखें और चार-पाँच सेकेंड के बाद सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे पहले छाती, कंधे और ठुड्डी को जमीन की ओर लाएं। पंजों को छोड़ दें और कुछ देर विश्राम करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन बार दोहराएं।
 9-   भुंजगासन (BHUJANGASANA/COBRA POSE)-                                                   


भुजंगासन करने के लिये सबसे पहले मुंह को नीचे की ओर करके पेट के बल लेट जाएं और फिर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। इसके बाद हथेलियों को कंधों और कुहनियों के बीच वाली जगह पर जमीन के ऊपर रख लें और नाभि से आगे तक के भाग को धीरे-धीरे सांप के फन की तरह ऊपर उठाएं। अब पैर की उंगलियों को पीछे की तरफ खींचकर रखेंताकि उंगलियां जमीन को छूने लगें। इस पोजीशन में कुछ देर के लिये रुकें और इसे कम से कम चार बार करें। भुजंगासन का नियमित अभ्यास करने से रक्त निर्माण की प्रक्रिया तेज हो जाती है और रक्त में ऑक्सीजन को मात्र बढती है |
 10- अर्धमत्स्येन्द्रासन(ARDH-MATASYENDRASANA/HAFLORD OF THE FISHES)


बैठकर दोनों पैर लंबे किए जाते हैं। तत्पश्चात बाएँ पैर को घुटने से मोड़कर एड़ी गुदाद्वार के नीचे जमाएँ। अब दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर खड़ा कर दें और बाएँ पैर की जंघा से ऊपर ले जाते हुए जंघा के पीछे जमीन पर रख दें। अब बाएँ हाथ को दाहिने पैर के घुटने से पार करके अर्थात घुटने को बगल में दबाते हुए बाएँ हाथ से दाहिने पैर का अँगूठा पकड़ें। अब दाहिना हाथ पीठ के पीछे से घुमाकर बाएँ पैर की जाँघ का निम्न भाग पकड़ें। सिर दाहिनी ओर इतना घुमाएँ क‍ि ठोड़ी और बायाँ कंधा एक सीधी रेखा में आ जाए। नीचे की ओर झुकें नहीं। छातीगर्दन बिल्कुल सिधी व तनी हुई रखें। यह एक तरफ का आसन हुआ। इस प्रकार पहले दाहिने पैर मोड़करएड़ी गुदाद्वार के नीचे दबाकर दूसरी तरफ का आसन भी करें। प्रारंभ में पाँच सेकंड यह आसन करना पर्याप्त है। फिर अभ्यास बढ़ाकर एक मिनट तक आसन कर सकते हैं। चित्तवृत्ति नाभि के पीछें के भाग में स्थित मणिपुर चक्र में स्थिर करें तथा श्वास दीर्घ रखें ।
 11-   सर्वांगासन(SARVANGASANA/ SUPPORTED SHOULDER STAND)-     

                        

सर्वांगासन में शरीर के सारे अंगों का व्यायाम एक साथ ही हो जाता हैइसलिये भी इस आसन को सर्वांगासन नाम दिया गया है। इसे करने के लिये सपाट जमीन पर बिछी चटाई पर पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों हाथों को शरीर के सटा कर रख लें। और इसके बाद दोनों पैरो को धीरे-धीरे ऊपर को उठाएं। पूरे शरीर को गर्दन से समकोण बनाते हुए सीधा लगाएं और ठोड़ी को सीने से लगा लें। इस स्थिति आने के बाद कम से कम दस बार गहरी सांस लें और फिर धीरे-धीरे से पैरों को नीचे ले आएं। सर्वांगासन को करने से शरीर का पूर्ण विकास होता है और थायरॉयड ग्रंथियों की क्रियाशीलता बढ़ती है। साथ ही इस आसन के नियमित अभ्यास से रक्त का संचार भी बढ़ता है और पाचन शक्ति बढ़ती है। जिससे एनीमिया  की समस्या से राहत मिलती है।

 12-   पश्चिमोत्तासन (PASHCHIMOTTASANA/ BACK STREACHING POSE)-


इससे शरीर फुर्तीला बनता है तथा यह मष्तिष्क की क्रियाशीलता को भी बढ़ाने में सहायक है यह आसन शरीर से विषैले तत्व की बाहर निकालकर शरीर की शुद्धि करता है इसको करने के लिए सर्वप्रथम  चटाई पर पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों पैर को फैलाकर रखें। दोनों पैरों को आपस में परस्पर मिलाकर रखें तथा अपने पूरे शरीर को बिल्कुल सीधा तान कर रखें। दोनों हाथों को सिर की ओर ऊपर जमीन पर टिकाएं। अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाते हुए एक झटके के साथ कमर के ऊपर के भाग को उठा लें। इसके बाद धीरे-धीरे अपने दोनों हाथों से पैरों के अंगूठों को पकड़ने की कोशिश करें। इस प्रकार यह क्रिया 1 बार पूरी होने के बाद 10 सैकेंड तक आराम करें। 
 13-   उत्तानपादासन (UTTANPADASAN/RAISE LEGS RIGHT ANGLE)-  


इस आसन को करने से जंघा एवं पेट की मासपेशियों में खिचाव उत्पन्न होता है इस खिचाव से पेट के आन्तरिक अंग जैसे - छोटी आंत ,एंजाइम उत्पादक ग्रंथियां और अन्य अंगों की कार्यक्षमता बढती है पेरों की उर्ध्वाधर स्तिथि के कारण हमारे शरीर का रक्त संचार सुचारू रूप से कार्य करने अगता है |उत्तानपादासन करने के लिये चमान पर बिछे आसन पर सीधे होकर ऐसे लेट जाएं और पेट के हिस्सा को ऊपर की ओर रखें। इसके बाद अपने दोनों हाथों को शरीर से सटाकर सीधा रख लें और हथेलियों से जमीन को छूते रहें। एक से दो मिनट तक इसी पोजीशन में रहें और फिर सांस लेते हुए दोनों पैरों को सीधा ऊपर की ओर उठा लें। और फिर सिर को जमीन से टिकाए रखें। अब पैरों को 90 डिग्री के कोण पर ऊपर की ओर रख लें। कुछ समय तक इसी पोजीशन में रहें और फिर धीरे-धीरे सांस को बाहर छोड़ते हुए सामान्य स्थिति में लौट आएं। इसके नियमित अभ्यास से रक्त संचार उत्तम होता है |उत्तानपादासन करने से एनीमिया की समस्या  दूर हो जाती है।

 14-   विपरीत-करणी मुद्रा (VIPREET-KARNI MUDRA/LEGS UP WALL POSE)- 

                                  

पीठ के बल जमीन पर लेट जाइए। दोनों पैरों को घुटने से मोड़कर जमीन के ऊपर उठाएं। इसके बाद एक हल्के झटके से नितम्ब को भी जमीन के ऊपर उठाइए। अब हाथों को कमर पर रखते हुए कमर को भी पैर तथा नितम्ब के साथ जमीन से ऊपर उठाइए। शरीर का भार कंधेगर्दन तथा हाथ पर रखिए। जब तक इस स्थिति में आसानी से रह सकेंरुके रहिए। इसके बाद धीरे-धीरे वापस नीचे आ जाइए। लेकिन एक बात ध्यान रखें कि उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगी इसका अभ्यास न कर शशांकासन का अभ्यास करें।
 15-   शवासन (SHAVASANA/CORPSE POSE)-                                


शारीरिकमानसिक थकावटएनीमिया, अनिद्राउच्च रक्तचापनाड़ियों की दुर्बलताचित्त की चंचलतायौन दुर्बलता आदि अनेक रोगों के लिए यह आसन कामधेनु के समान फायदा देने वाला होता है। इसके लिए सर्वप्रथम पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाइए। हाथों को पांव की सीध में सीधा कर दीजिए। पैरों को एकदम सीधा रखिए। फिर आंखें बंद कर लीजिए और सांस धीरे-धीरे लीजिए। सभी स्नायुयों , नाड़ियों और अवयवों को अत्यन्त शिथिल कर दीजिए। धीरे-धीरे गहरी सांसों को लेते जाइए। नियमित रूप से 10-15 मिनट तक इस मुद्रा में रहने का अभ्यास कीजिए। उपरोक्त आसनों द्वारा जहां उच्च रक्तचाप के रोगियों को विशेष लाभ मिलता हैवहीं स्वस्थ व्यक्तियों को इन रोगों से बचाव मिलता है।

 16-   चक्रासन (CHAKRASAN/WHEEL POSE) -                                            


मेरुदंड को लचिला बनाकर शरीर को वृद्धावस्था से दूर रखता है। शरीर में शक्ति और स्फूर्ति बनी रहती है।सर्वप्रथम शवासन में लेट जाएं। फिर घुटनों को मोड़करतलवों को भूमि पर अच्छे से जमाते हुए एड़ियों को नितंबों से लगाएं। कोहनियों को मोड़ते हुए हाथों की हथेलियों को कंधों के पीछे थोड़े अंतर पर रखें। इस स्थिति में कोहनियां और घुटनें ऊपर की ओर रहते हैं। श्वास अंदर भरकर तलवों और हथेलियों के बल पर कमर-पेट और छाती को आकाश की ओर उठाएं और सिर को कमर की ओर ले जाए। फिर धीरे-धीरे हाथ और पैरों के पंजों को समीप लाने का प्रयास करेंइससे शरीर की चक्र जैसी आकृति बन जाएगी। अब धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए शरीर को ढीला करहाथ-पैरों के पंजों को दूर करते हुए कमर और कंधों को भूमि पर टिका दें। और पुन: शवासन की स्थिति में लौट आएं।

 17-   हलासन (HALASANA/PLOUGH POSE)-                                       


यह आसन उनके लिए बहुत कारगर है जो लम्बे समय तक बैठते हैं और जिन्हें पोस्चर  संबंधी समस्या है। ये थायराइड ग्रंथिपैराथायराइड ग्रंथिफेफड़ों और पेट के अंगों को उत्तेजित करता है जिससे रक्त का प्रवाह सर और चेहरों की और तेज़ हो जाता है जिससे पाचन प्रक्रिया में सुधार होता है और हारमों का स्तर नियंत्रण में रहता है। तथा रक्त निर्माण की प्रक्रिया को तेज कर एनीमिया के रोगी को लाभ पहुंचाता है फर्श पर चित होकर लेट जाएं। अपनी बांहों को बगल में रखें और घुटनों को मोड़ लें ताकि आपका तलवा फर्श को छूए। अब धीरे धीरे अपनी पुष्टिका से पैरों को उठाएं। पैर उठाते वक्त अपने हाथों को पुष्टिका पर रखकर शरीर को सपोर्ट करें। अब धीरे धीर अपने पैरों को पुष्टिका के पास से मोड़ें और सर के पीछे ले जाकर पंजों को फर्श तक ले जाने की कोशिश करें। और हाथों को बिलकुल सीधा रखें ताकि वो फर्श के संपर्क में रहे। ऊपर जाते हुए सांस छोड़ें। लेटने वाली मुद्रा में वापस लौटने के लिए पैरों को वापस लाते हुए सांस लें। एकदम से नीचे न आएं।
 18-   उष्ट्रासन( USHTRASANA/ CAMEL POSE)-                                         


एनीमिया ,उदर संबंधी रोगजैसे कॉस्ट्रयूपेशनइनडाइजेशनएसिडिटी रोग निवारण में इस आसन से सहायता मिलती है। गले संबंधी रोगों में भी यह आसन लाभदायक है। वज्रासन की स्थिति में बैठ जाते हैंउसके बाद घुटनों के ऊपर खड़े होकर एड़ी-पंजे मिले हुए तथा पैरों के अँगूठे की आकृति अंदर की ओर रखते हैं। अब दोनों हाथों को सामने से ऊपर की ओर ले जाते हैं। दोनों हाथ को कान से मिलाकर रखते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों हाथों के मध्‍य सिर रहता है। उसके बाद सिर से जंघाओं का भाग पीछे की ओर उलटते हुए हाथ के पंजों से एड़ियों को पकड़ें या पगथलियों पर हथेलियाँ रखें। उसके बाद गर्दन को ढीला छोड़ते हुए कमर को ऊपर की ओर ले जाएँ तथा सिर पीछे की ओर लटका रहेअर्थात झुका रहेगा। वापस आते समय दोनों हाथों को घुमाते हुए वापस आ जाते हैं तथा वज्रासन खोल देते हैं।

 19-   यस्तिकासन ( YASTIKASANA/ UPWARD STRECH POSE)-               


यस्तिकासन को करने से हमारे सम्पूर्ण शरीर की मासपेशियों में खिचाव उत्पन्न होता है जिससे हमारे शरीर में लचीलापन आ जाता हैं यह आसन पेट एवं पेल्विक मसल्स को रिलैक्स करने में मददगार होता है  ये आसन रीढ़ की कोशिकाओं को व्यवस्थित करता हैरीढ़ एवं कमर दर्द में उपयोगी होता है , एक निश्चित आयु तक कद वृद्धि में सहायक होता है   इसे करने के लिए सर्वप्रथम  पीठ के बल लेट जाएं अब  श्वास लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपरले जाते हुए जमीन पर टिका दें इसके बादपांव के पंजों से शरीर के नीचले हिस्से को खींचे और हाथों से शरीर के ऊपरी हिस्से को खीचने का प्रयास करें अब  इस खिंचाव की स्थिति में 6 सेकंड रूकें। अंत में श्वास छोड़ते हुए पूर्व स्थिति में आएं।इस क्रिया को चार बार तक करें फिर कुछ देर आराम के बाद पुनः कर  सकते है |
 ****उपरोक्त योगासन को आप अपने दैनिक जीवन में अपनाकर आप एनीमिया जैसी प्राणघातक बीमारी के खतरे को कम कर सकते हैं ****

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